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क्या है समस्या?: मद्रास हाई कोर्ट ने दीपम जलाने पर रोक को लेकर तमिलनाडु सरकार को लगाई फटकार

Agent4712 Dec 20251 min read
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प्रस्तावना: आस्था, प्रशासन और न्यायपालिका का टकराव

मदुरै के ऐतिहासिक तिरुपरनकुंड्रम मंदिर (Thiruparankundram Temple) में हाल ही में आस्था और प्रशासनिक हठधर्मिता के बीच एक तीखा संघर्ष देखने को मिला। मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को कड़ी फटकार लगाई है, क्योंकि राज्य प्रशासन ने श्रद्धालुओं को पहाड़ी पर स्थित पारंपरिक 'कार्तिगई दीपम' जलाने से रोक दिया था। यह मामला अब केवल एक अनुष्ठान का नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सरकारी नियंत्रण का प्रतीक बन गया है।

मुख्य विवाद:

विवाद का केंद्र मंदिर की पहाड़ी पर स्थित 'दीपथून' (Deepathoon) है। जहाँ उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद, HR&CE विभाग (हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग) ने सुरक्षा और अधिकारों का हवाला देते हुए दीप जलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब परंपरा का पालन करने के लिए पहाड़ी पर चढ़ने का प्रयास कर रहे कई भक्तों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। प्रशासन की इस कार्रवाई ने न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने पर मजबूर कर दिया। कोर्ट ने सरकार से स्पष्ट सवाल किया है कि जब आस्था का विषय हो, तो प्रशासन अड़ंगा क्यों लगा रहा है?

घटनाक्रम एक नज़र में:
  • स्थान: तिरुपरनकुंड्रम, मदुरै।
  • ⚖️ न्यायालय का रुख: तमिलनाडु सरकार की रोक पर नाराजगी।
  • तनाव का कारण: भक्तों की गिरफ्तारी और दीपम जलाने से इनकार।

विवाद की जड़: क्या है 'दीपथून' और क्यों है यह महत्वपूर्ण?

इस पूरे कानूनी और धार्मिक विवाद के केंद्र में मदुरै के तिरुपरनकुंड्रम मंदिर की पहाड़ी पर स्थित एक पत्थर का स्तंभ है, जिसे स्थानीय रूप से 'दीपथून' (Deepathoon) के नाम से जाना जाता है। यह केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था का प्रतीक है।

आस्था बनाम प्रशासन

पारंपरिक रूप से, कार्तिगई दीपम के पावन अवसर पर भक्त इस 'दीपथून' पर विशाल दीप प्रज्वलित करते आए हैं। मान्यता है कि यहाँ जलाई गई ज्योति पूरे क्षेत्र से अंधकार को दूर करती है।

हालाँकि, तमिलनाडु सरकार और हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR&CE) ने इस प्रथा पर कड़ा रुख अपनाया है। सरकार की विशिष्ट आपत्ति यह है कि:

  • याचिकाकर्ताओं के पास इस स्थान पर दीप जलाने का कोई वैधानिक अधिकार (Legal Right) नहीं है।
  • सरकार का दावा है कि इस विशिष्ट स्तंभ पर दीप जलाना किसी प्रमाणित 'प्राचीन परंपरा' का हिस्सा नहीं है और इसके समर्थन में पर्याप्त सबूतों का अभाव है।

महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts)

स्थान (Location): तिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी, मदुरै
विवादित स्थल: दीपथून (पत्थर का स्तंभ)
सरकार द्वारा अस्वीकृति की तारीख: 3 नवंबर, 2025

घटनाक्रम: हाई कोर्ट के आदेश से लेकर पुलिस कार्रवाई तक

मदुरै के तिरुपरनकुंड्रम मंदिर में कार्तிகை दीपम जलाने का मुद्दा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह न्यायपालिका के आदेश और प्रशासन के रवैये के बीच एक सीधा टकराव बन गया। आइए इस पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

3 नवंबर, 2025

सरकार द्वारा अनुमति से इनकार

विवाद की शुरुआत तब हुई जब राज्य सरकार और स्थानीय पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा और परंपरा का हवाला देते हुए 'दीपथून' (पहाड़ी स्तंभ) पर दीपम जलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। प्रशासन का तर्क था कि याचिकाकर्ताओं के पास इसके लिए कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

1 दिसंबर, 2025

हाई कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश

भक्तों की याचिका पर सुनवाई करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने स्पष्ट आदेश दिया कि मंदिर की पहाड़ी पर दीपम जलाने की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और परंपरा का हिस्सा माना।

आदेश के बाद (Post-Order)

प्रशासन की नाफरमानी और विरोध

कोर्ट के आदेश के बावजूद, राज्य मशीनरी ने अनुपालन नहीं किया। जब श्रद्धालु दीप जलाने के लिए पहाड़ी की ओर बढ़े, तो पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें रोक दिया।

  • भक्तों ने प्रतिबंध के बावजूद दीप जलाने का प्रयास किया।
  • मौके पर भारी विरोध प्रदर्शन हुआ और पुलिस के साथ तीखी नोकझोंक हुई।
पुलिस कार्रवाई

113 भक्तों पर केस दर्ज

स्थिति तब और बिगड़ गई जब पुलिस ने कोर्ट के आदेश का पालन कराने के बजाय, दीप जलाने का प्रयास कर रहे लगभग 113 श्रद्धालुओं के खिलाफ मामले दर्ज कर लिए। इस कार्रवाई ने ही मद्रास हाई कोर्ट को राज्य सरकार को फटकार लगाने पर मजबूर किया, जिसे कोर्ट ने प्रथम दृष्टया 'अदालत की अवमानना' माना है।

निष्कर्ष: यह घटनाक्रम दर्शाता है कि कैसे एक धार्मिक अनुष्ठान प्रशासनिक हठधर्मिता के कारण कानूनी लड़ाई में बदल गया।

कोर्ट बनाम सरकार: 'सह-अस्तित्व' बनाम 'नियम'

मद्रास हाई कोर्ट की हालिया टिप्पणी केवल एक दीप जलाने के बारे में नहीं है, बल्कि यह प्रशासन और आस्था के बीच संतुलन का एक बड़ा सवाल है। जहां एक ओर कोर्ट ने 'सह-अस्तित्व' (Coexistence) और धार्मिक सौहार्द पर जोर दिया है, वहीं राज्य सरकार ने प्रक्रियात्मक नियमों और परंपरा की प्रमाणिकता को ढाल बनाया है।

न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति बी. पुगलेंधी की खंडपीठ ने सरकार से सीधा सवाल किया कि यदि भक्त पहाड़ी की चोटी पर दीप जलाते हैं, तो इससे प्रशासन को क्या समस्या है? नीचे दी गई तालिका में दोनों पक्षों की दलीलों का विश्लेषण देखें:

याचिकाकर्ता और कोर्ट का रुख
  • परंपरा का सम्मान: दीपम जलाना एक प्राचीन अनुष्ठान है जिसे रोका नहीं जाना चाहिए।
  • सह-अस्तित्व: कोर्ट का मानना है कि सभी समुदायों को शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहना चाहिए।
  • भक्तों की भावना: यह केवल एक पत्थर का खंभा नहीं, बल्कि आस्था का केंद्र है।
तमिलनाडु सरकार का तर्क
  • अधिकार क्षेत्र: याचिकाकर्ताओं के पास इस मांग को रखने का कोई कानूनी अधिकार (Locus Standi) नहीं है।
  • परंपरा पर सवाल: सरकार का दावा है कि 'दीपथून' (स्तंभ) का कोई पारंपरिक महत्व नहीं है।
  • प्रशासनिक नियंत्रण: सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबंध आवश्यक हैं।

HR&CE विभाग की भूमिका पर सवाल

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बड़ी तस्वीर: क्या यह 'सनातन' विरोधी रुख है?

तिरुपरनकुंड्रम मंदिर में दीपम जलाने को लेकर उपजा यह विवाद अब केवल एक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रह गया है। मद्रास हाई कोर्ट की फटकार ने राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता और सरकारी हस्तक्षेप पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। यह मामला अब प्रशासनिक दायरे से निकलकर राजनीतिक अखाड़े में पहुंच चुका है।

विवाद और 'सनातन' का कोण

विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा ने इस घटना को तमिलनाडु सरकार के कथित 'सनातन विरोधी' रुख का प्रमाण बताया है। उनका आरोप है कि राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन जानबूझकर हिंदू परंपराओं को निशाना बना रहे हैं, जबकि अन्य धर्मों के मामलों में सरकार का रवैया नरम रहता है। इसे आगामी चुनावों के मद्देनजर एक ध्रुवीकरण के मुद्दे के रूप में भी देखा जा रहा है।

HR&CE विभाग बनाम भक्त: संघर्ष के बिंदु

  • परंपरा बनाम अधिकार: हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग का तर्क है कि 'दीपथून' (स्तंभ) पर दीप जलाना एक स्थापित प्रथा नहीं है, जबकि भक्त इसे अपनी सदियों पुरानी परंपरा और अधिकार मानते हैं।
  • अत्यधिक नियंत्रण: आलोचकों का कहना है कि सरकार मंदिरों के सूक्ष्म प्रबंधन (micromanagement) में लगी है, जिससे भक्तों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँच रही है।

⚖️ वर्तमान स्थिति और निष्कर्ष

फिलहाल, मद्रास हाई कोर्ट ने सरकार के तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि "भक्तों की भावनाओं को तकनीकी आधार पर कुचला नहीं जा सकता।" यह फैसला राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। कोर्ट का यह कड़ा रुख संकेत देता है कि भविष्य में सरकार को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने से पहले परंपराओं और जनभावनाओं का सम्मान करना होगा।

Frequently Asked Questions

Q: तिरुपरनकुंड्रम दीपम विवाद का मुख्य कारण क्या है?

A: यह विवाद मदुरै के तिरुपरनकुंड्रम मंदिर की पहाड़ी पर पारंपरिक 'कार्तिगई दीपम' जलाने को लेकर है। तमिलनाडु सरकार और HR&CE विभाग ने सुरक्षा और नियमों का हवाला देकर इस पर रोक लगा दी थी, जिसे लेकर श्रद्धालुओं और प्रशासन के बीच संघर्ष हुआ।

Q: मद्रास हाई कोर्ट ने इस मामले में क्या फैसला सुनाया?

A: मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया कि भक्तों को दीप जलाने की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने कहा कि तकनीकी आधार पर श्रद्धालुओं की आस्था और भावनाओं को कुचला नहीं जा सकता और सरकार को धार्मिक कार्यों में बाधा नहीं डालनी चाहिए।

Q: सरकार ने दीप जलाने पर रोक क्यों लगाई थी?

A: सरकार और HR&CE विभाग का तर्क था कि याचिकाकर्ताओं के पास उस स्थान ('दीपथून') पर दीप जलाने का कोई वैधानिक अधिकार (Legal Right) नहीं है और यह प्रथा किसी प्रमाणित प्राचीन परंपरा का हिस्सा नहीं है। इसके अलावा, उन्होंने सुरक्षा कारणों का भी हवाला दिया।

Q: 'दीपथून' (Deepathoon) क्या है?

A: 'दीपथून' तिरुपरनकुंड्रम मंदिर की पहाड़ी पर स्थित एक पत्थर का स्तंभ है। यह स्थानीय आस्था का केंद्र है, जहाँ भक्त सदियों से कार्तिगई दीपम के अवसर पर विशाल दीप प्रज्वलित करते आए हैं, जिसे वे अंधकार दूर करने वाला मानते हैं।

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