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भगवान शिव को क्यों कहा जाता है नीलकंठ? जानिए कारण
Vivek Shukla05 Jun 2023 • 1 min read
05 Jun 2023 • 1 min read

Vivek Shukla
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भगवान शिव शंकर को हिंदू धर्म में प्रमुख देवताओं में से एक माना जाता है। उनके गले में नाग लटकाए हुए हैं, हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। भगवान शिव को हम अनेक नामों से जानते हैं, जैसे महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र और नीलकंठ। इन नामों के कई मतलब हैं। नीलकंठ का एक प्रसिद्ध नाम होने के पीछे कहानी है जिसे आज हम आपके साथ साझा करने जा रहे हैं।
पुराणों के अनुसार, देवता और राक्षसों के बीच एक बार अमृत को प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया गया था, जिसे हम क्षीरसागर (दूध के समुद्र) कहते हैं। इस मंथन के दौरान, 14 महत्वपूर्ण रत्न प्रकट हुए, जैसे लक्ष्मी, शंख, कौस्तुभ मणि, ऐरावत, पारिजात, उच्चैःश्रवा, कामधेनु, कालकूट, रम्भा नामक अप्सरा, वारुणी मदिरा, चन्द्रमा, धन्वन्तरि, अमृत और कल्पवृक्ष।
उन्होंने समझ लिया कि इन रत्नों की मदद से अमृत प्राप्त किया जा सकता है, जिससे अनन्त जीवन प्राप्त हो सकता है।
इस प्रकार, देवता और राक्षसों ने समुद्र मंथन को जारी रखा और अमृत को प्राप्त करने की कोशिशें जारी रखीं। लेकिन, इस प्रक्रिया के दौरान विष भी प्रकट हुआ। यह विष अत्यंत विषाकारी था और उसकी एक बूंद मात्र ही पूरे संसार को नष्ट करने की शक्ति रखती थी। जब देवता और राक्षस इस बात की जानकारी प्राप्त कर ली,वे भयभीत हो गए और इसका समाधान खोजने के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे।
भगवान शिव ने एक उपाय निकाला, जिसके अनुसार उन्हें इस विष को पूरी तरह से पीना था। शिव जी ने विष भरे हुए घड़े को उठाया और अचानक पूरा उसे पी गए, लेकिन वे इस विष को गले में निगलने वाले नहीं थे। उन्होंने इस विष को अपने गले में ही रख लिया। इसलिए उनके गले का रंग नीला पड़ गया और उनका नाम नीलकंठ पड़ा।
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